#142. गीता मनन: रात और दिन का रहस्य - योगी की जागृति (अध्याय 2, श्लोक 69-71)

नमस्ते दोस्तों,

भगवद् गीता के दूसरे अध्याय का यह भाग ज्ञानयोग के सबसे गूढ़ और सुंदर सिद्धांतों में से एक को उजागर करता है। इन श्लोकों में भगवान श्री कृष्ण योगी (स्थिरप्रज्ञ व्यक्ति) और साधारण संसारी व्यक्ति के बीच के मौलिक अंतर को समझाते हैं। यह अंतर बाहरी क्रियाओं में नहीं, बल्कि उनकी आंतरिक चेतना (Inner Consciousness) में होता है।

श्लोक 69 से 71 हमें सिखाते हैं कि सच्ची शांति और स्थिरता तभी मिलती है जब हम संसार के मोह से ऊपर उठकर अपनी चेतना को परम सत्य में स्थिर करते हैं।


श्लोक 69: योगी की रात, संसारी का दिन

या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागति संयमी। यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः।। (69)

अर्थ: जो सब प्राणियों के लिए रात है, उसमें संयमी पुरुष (योगी) जागता है। और जिसमें सब प्राणी जागते हैं, वह आत्मज्ञानी मुनि के लिए रात है।

आज के लिए सार: यह श्लोक चेतना के विपरीत ध्रुवों को समझाता है।

  • संसारियों का दिन = योगी की रात:

    • संसारियों का दिन: साधारण व्यक्ति दिनभर किस चीज़ में व्यस्त रहता है? धन कमाना, इंद्रियों के विषयों का भोग करना, मान-सम्मान की चिंता करना, और आसक्ति बढ़ाना।

    • योगी की रात: ये सारी सांसारिक प्रवृत्तियाँ और मोह योगी के लिए 'रात' के समान हैं—अर्थात वह इन चीज़ों में अंधा होता है, इनमें उसका कोई आकर्षण नहीं होता।

  • संसारियों की रात = योगी का दिन:

    • योगी का दिन: योगी किस चीज़ में जागता है? आत्म-ज्ञान, परमात्मा का चिंतन, और सत्य की खोज। वह आंतरिक सत्य को स्पष्ट रूप से देखता है।

    • संसारियों की रात: साधारण व्यक्ति के लिए यह आत्म-तत्व 'रात' के समान है—वह इससे पूरी तरह अपरिचित और अंधेरे में रहता है।

यह श्लोक बताता है कि योगी की प्राथमिकताएँ, दुनिया की प्राथमिकताओं के बिल्कुल विपरीत होती हैं।


श्लोक 70: इच्छाओं से अप्रभावित, अथाह समुद्र

आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्वत्। तद्वत्कामा यं प्रविशन्ति सर्वे स शान्तिमाप्नोति न कामकामी।। (70)

अर्थ: जिस प्रकार संपूर्ण नदियाँ जल से भरकर भी समुद्र में प्रवेश कर जाती हैं, परंतु समुद्र अपनी अचल प्रतिष्ठा (स्थिरता) को बनाए रखता है (वह विचलित नहीं होता), उसी प्रकार जिस पुरुष में सभी इच्छाएँ (कामनाएँ) प्रवेश कर जाती हैं, फिर भी वह अविचलित रहता है, वही शांति को प्राप्त करता है, न कि इच्छाओं की पूर्ति चाहने वाला।

आज के लिए सार: यह श्लोक सिखाता है कि शांति इच्छाओं को खत्म करने से नहीं, बल्कि उनसे अप्रभावित रहने से मिलती है।

  • समुद्र का दृष्टांत: हमारा मन समुद्र की तरह होना चाहिए। इच्छाएँ (कामनाएँ) नदियों की तरह हैं जो लगातार मन में आती रहती हैं।

  • अचल प्रतिष्ठा: योगी इन इच्छाओं को अस्वीकार नहीं करता, लेकिन वह उनके सामने झुकता भी नहीं। वह अपनी आंतरिक शांति को भंग किए बिना उन्हें आने और जाने देता है।

  • सच्ची शांति: जो व्यक्ति यह सोचता है कि मैं इच्छाओं को पूरा करके शांत हो जाऊँगा, वह कभी शांत नहीं होता। शांति उसे मिलती है जो इच्छाओं के आने-जाने से अविचलित रहता है।


श्लोक 71: अहंकार का त्याग ही परम शांति है

विहाय कामान्यः सर्वान्पुमांश्चरति निःस्पृहः। निर्ममो निरहङ्कारः स शान्तिमधिगच्छति।। (71)

अर्थ: जो पुरुष सभी इच्छाओं को त्यागकर, निःस्पृह (किसी चीज़ की लालसा न रखने वाला), ममता रहित ('यह मेरा है' का भाव न रखने वाला), और अहंकार रहित होकर विचरण करता है, वही परम शांति को प्राप्त करता है।

आज के लिए सार: यह श्लोक परम शांति के तीन स्तंभों को परिभाषित करता है।

  • निःस्पृह (No Desire): इच्छाओं की लालसा का त्याग।

  • निर्मम (No Attachment): किसी भी वस्तु या व्यक्ति में 'मेरा' (Mamta) का भाव न रखना। यह समझना कि सब कुछ अस्थायी है।

  • निरहंकार (No Ego): अहंकार का त्याग—यानी, 'मैं कर्ता हूँ' के भाव से मुक्त होना।

जब ये तीनों स्तंभ मजबूत होते हैं, तभी व्यक्ति उस परम शांति को प्राप्त करता है जिसकी तलाश में संसार भाग रहा है।


निष्कर्ष

यह खंड हमें सिखाता है कि जीवन में सच्चा सुख और सफलता केवल आंतरिक बदलाव से मिलती है। बाहरी दुनिया की दौड़ में भागने के बजाय, अपनी चेतना को जगाएँ। अपने मन को उस समुद्र की तरह शांत और अचल बनाएँ, जिसमें इच्छाओं की नदियाँ आकर विलीन हो जाएँ, लेकिन वह अपनी स्थिरता न खोए।

धन्यवाद,
Madhusudan Somani,
Ludhiana, Punjab.

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